36 वर्षीय Madhuri Elephant (जिसे महादेवी भी कहा जाता है) को गुजरात के जामनगर स्थित वंतारा (Vantara) के वन्यजीव पुनर्वास केंद्र में स्थानांतरित किए जाने के फैसले ने कोल्हापुर में जनभावनाओं को झकझोर दिया है। धार्मिक आस्था, परंपराओं और पशु कल्याण कानूनों के बीच फंसी इस हाथी की कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है।
3 अगस्त 2025 को कोल्हापुर में हजारों लोग एकत्रित हुए और शांतिपूर्ण मौन रैली निकालकर Madhuri Elephant को वापस लाने की मांग की। यह विरोध केवल एक हाथी को लेकर नहीं था, बल्कि लोगों की भावनाओं, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई बन गया है।
कौन है Madhuri Elephant और क्यों है ये इतनी महत्वपूर्ण?
Madhuri Elephant वर्ष 1992 से कोल्हापुर के स्वस्तिश्री जिंसेन भट्टारक पट्टाचार्य महास्वामी मठ की शोभा रही है। वह वर्षों से धार्मिक जुलूसों में भाग लेती रही और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रही। लोगों का मानना है कि मठ में उसकी उपस्थिति से सुख-समृद्धि आती है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसकी देखभाल को लेकर सवाल उठने लगे। आरोप लगे कि उसे एकांतवास में रखा गया, कठोर परिस्थितियों में काम कराया गया और व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग किया गया। इन परिस्थितियों ने कोर्ट को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर किया और अंततः उसे वंतारा में स्थानांतरित करने का आदेश दिया गया।
मौन रैली: आस्था और भावना का प्रदर्शन
3 अगस्त 2025 को सुबह 5 बजे नंदनी से शुरू हुई मौन रैली कोल्हापुर जिला कलेक्ट्रेट पर समाप्त हुई। पूर्व सांसद और स्वाभिमानी किसान संघठन के पूर्व अध्यक्ष राजू शेट्टी के नेतृत्व में लगभग 45 किलोमीटर की यह रैली निकाली गई, जिसमें कोल्हापुर, सांगली और सतारा जिलों के 30,000 से अधिक लोग शामिल हुए।
प्रदर्शनकारियों ने रिलायंस समूह की टेलीकॉम कंपनी जियो का बहिष्कार भी शुरू कर दिया है। केवल चार दिनों में कोल्हापुर, सांगली और सतारा में 1.5 लाख से अधिक मोबाइल यूजर्स ने अपने सिम अन्य नेटवर्क में पोर्ट करा दिए। राजू शेट्टी ने आरोप लगाया कि यह पूरा मामला PETA और अंबानी समूह की मिलीभगत का परिणाम है, जिनका उद्देश्य मंदिरों के हाथियों को जब्त करना है। उन्होंने कहा कि अब उत्तर कर्नाटक में भी इसी तरह के आंदोलन किए जाएंगे, जहां कई मंदिरों में हाथी मौजूद हैं।
कानूनी लड़ाई: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले
Madhuri Elephant को वंतारा भेजने का फैसला अचानक नहीं लिया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 जुलाई 2025 को जैन मठ की याचिका खारिज कर दी, जिसमें हाथी के ट्रांसफर पर रोक लगाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने पशु कल्याण विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए कहा कि हाथी के स्वास्थ्य की गंभीर उपेक्षा की जा रही थी।
जांच रिपोर्ट्स में पाया गया कि हाथी के पैरों में फंगल इन्फेक्शन (फुट रॉट), घाव, बड़े हुए नाखून और मानसिक तनाव के लक्षण थे। मठ द्वारा प्रस्तुत स्वास्थ्य प्रमाण पत्रों को कोर्ट ने सतही और तथ्यहीन करार दिया। कोर्ट ने कहा कि परंपराओं और धार्मिक आयोजनों के नाम पर किसी जानवर के साथ अत्याचार को उचित नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को 28 जुलाई को बरकरार रखा और हाथी के ट्रांसफर के आदेश को वैध ठहराया।
वंतारा का स्पष्टीकरण: सच्चाई क्या है?
विवाद बढ़ने के बाद वंतारा ने 3 अगस्त को एक बयान जारी किया, जिसमें Madhuri Elephant के ट्रांसफर को लेकर फैलाए जा रहे झूठे प्रचार पर सफाई दी गई। वंतारा ने स्पष्ट किया कि हाथी के ट्रांसफर की प्रक्रिया में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। यह निर्णय पर्यावरण और वन मंत्रालय की हाई पावर कमेटी (HPC) द्वारा लिया गया था।
वंतारा ने बताया कि PETA वर्ष 2022 से ही Madhuri Elephant की स्थिति पर निगरानी रखे हुए था। अक्टूबर 2023 में HPC को दी गई शिकायत में विस्तृत रिपोर्ट, फोटो और चिकित्सा दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, जिसमें हाथी की शारीरिक चोटें, अवैध उपयोग और मानसिक यातनाओं के प्रमाण दिए गए थे।
2012 से 2023 के बीच Madhuri को महाराष्ट्र से तेलंगाना तक 13 बार ले जाया गया, जिनमें से कई बार आवश्यक अनुमति भी नहीं ली गई थी। तेलंगाना वन विभाग ने जनवरी 2023 में उसके महावत इस्माइल के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मामला भी दर्ज किया था। हालांकि मामला जुर्माना देकर सुलझा दिया गया, पर इससे यह साबित हो गया कि नियमों का उल्लंघन हुआ था।
परंपरा बनाम पशु अधिकार: एक जटिल संघर्ष
वंतारा की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि Madhuri Elephant का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था। उसे मुहर्रम, भिक्षा मांगने, बच्चों को सूंड पर बिठाकर घुमाने और अवैध रूप से पवित्र पूजाओं में किराए पर दिया जा रहा था। वर्ष 2017 में मठ के प्रधान पुजारी की हाथी द्वारा कुचलकर मृत्यु भी हुई थी, जिससे सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं।
अगस्त 2023 में किए गए चिकित्सा परीक्षण में Madhuri के शरीर पर खुले घाव, लंगड़ाहट और मानसिक तनाव के लक्षण मिले थे। स्थानीय पुलिस की सिफारिश पर पशु चिकित्सकों की टीम ने भी हाथी को तत्काल उपचार और पुनर्वास की सलाह दी थी। बावजूद इसके, मठ को हाथी की देखभाल में सुधार के लिए 3 महीने का समय दिया गया, लेकिन निरीक्षणों में कोई ठोस सुधार नहीं पाया गया। इसके बाद HPC ने 27 दिसंबर 2024 को हाथी को जामनगर स्थित राधे कृष्णा टेम्पल एलीफेंट वेलफेयर ट्रस्ट में स्थानांतरित करने का आदेश दिया।
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जनता की भावना बनाम कानूनी निर्णय: समाधान कैसे होगा?
कोर्ट के फैसले और वेटनरी रिपोर्ट्स के बावजूद कोल्हापुर में Madhuri Elephant की वापसी की मांग जोर पकड़ रही है। BJP सांसद धनंजय महाडिक ने भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से हस्तक्षेप की मांग की है।
वहीं, पशु कल्याण विशेषज्ञों का कहना है कि परंपराएं समय के साथ बदलनी चाहिए और जानवरों के अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है। वंतारा ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के बावजूद झूठी जानकारी फैलाकर संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है, जो न्यायिक प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कमजोर करती है।
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निष्कर्ष
Madhuri Elephant का मामला केवल एक हाथी के ट्रांसफर का नहीं है, बल्कि यह भारत में परंपरा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन की बड़ी बहस का प्रतीक बन गया है। जहां एक ओर अदालतों ने हाथी के स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता दी है, वहीं दूसरी ओर जनता की भावनाएं इस फैसले को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस कर रही हैं।
आवश्यक है कि दोनों पक्ष—पशु कल्याण संगठनों और स्थानीय समुदायों—के बीच संवाद स्थापित हो ताकि Madhuri Elephant जैसे मामलों में भावनाओं और पशु अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
वक्त आ गया है कि परंपराओं को इस दिशा में संवेदनशील बनाया जाए, जहां ऐसे जीवित प्रतीकों को श्रद्धा के साथ सही देखभाल और सम्मान भी मिल सके।




